Thursday, September 29, 2011

त्रिएकता की महत्‍वपूर्णता

संजयनगर

त्रिएकता का सिद्धांत बाईबल में बडा महत्‍व रखता है। यह न केवल तर्कसंगत है बल्कि बाईबल आधारित है।

1. त्रिएकता सदगुण का आधार है

सदगुणों का अस्तित्‍व आनादीकाल से है। वे अनंत है इस कारण से निरपेक्ष्‍ा है। वे अनंत इस लिए है क्‍यों कि उनका अस्तित्‍व त्रिएकता परमेश्‍वर में है। परमेश्‍वर निर्गुण नही है। अगर वैसा होता तो भलाई और बुराई, शुभ एवं अशुभ का कोई शास्‍वत अर्थ नही रहता। बाईबल बताती है कि परमेश्‍वर प्रेम है। और प्रेम अनेकता में एकता का सदगुण है। यदी परमेश्‍वर जगत के निर्माण से पहले अकेला ही होता तो प्रेम अर्थहीन होता क्‍योंकि फिर वह किस से प्रेम करता। फिर प्रेम स्‍वयं एक लौकिक आवश्‍यकता बनती और इसका आलौकिक आधार नही होता। अनादीकाल से पिता, पुत्र, एवं पवित्रात्‍मा की एकता ही सदगुण का अनंत आधार है।

2. त्रिएकता संबंध का आधार है

भाषा में भी हम तीन व्‍यक्तित्‍व का प्रयोग जानते है। मै, तुम, और वह। अनंतकाल से त्रिएक परमेश्‍वर आत्‍मा का प्रेम के संबंध में एक है। यही एैक्‍य मनुष्‍यों में भी प्रेम पर आधारित रिश्‍तों का आधार है।
यह एकता अहम रहित है। यही सच्‍ची संगती और सहभागिता का आधार भी है।

3. त्रिएकता सत्‍य का आधार है

वही व्‍यक्तिवाचक एवं विषयवाचक का आधार है। यदी ईश्‍वर जगत के निर्माण से पहले त्रिएक न होता तो उसे किसी वस्‍तु का ज्ञान भी नही होता, अर्थात सत्‍य ज्ञान का अस्तित्‍व भी नही होता। पर पिता, पुत्र, एवं पवित्रात्‍मा अनादी काल से एक दूसरे के ज्ञान से परिपूर्ण है। यही जगत में भी सत्‍य का आधार है।

यह जानना आवश्‍यक है कि त्रिएकता का अर्थ त्रिमूर्तीवाद या तीनैश्‍वरवाद नही है। परमेश्‍वर तीन नही पर एक है। तीनों व्‍यक्तित्‍व की केवल एक ही तत्‍व है। और वे एक है। यह समझना मनुष्‍यों के लिए कठिन है, पर यह तर्क द्वारा अपेक्षित भी है।